Кот Шуньяты / Смотрящий по Люмпини
Кот Шуньяты
Жара давила так, что плавились подковы.
Он крышевал с бордюра пустоту.
Не смейте, пацаны, будить нирвану в полдень.
Простите, дон, я не смутил ваш дзэн?
Он вечность щурил, отжимая двор.
В его зевке пропал отряд спецназа.
Согласовать бы с паханом жару.
Он в местной карме — вор, почти в законе.
О, как авторитетно он молчал.
Напрасно ты быкуешь на Шуньяту.
Взглянул — вараний рэкет впал в астрал.
Бордюр под ним стонал от уваженья.
Смотрящий спал,
держа оскал в ухмылке.
Он так лежал, что мусор извинялся.
Да, этот хвост диктует нам погоду.
И карма отстегнула долю в срок.
Асфальт под ним давно достиг самадхи.
Братва сдавала «Вискас» на общак.
Район стихал, когда он умывался.
Он так зевал, что трескались причины.
Коты помельче звали его «батя».
Вороны, суетливые монахи,
кружили, не решаясь сесть при нём.
Он лапой правил местные сезоны
и когтем выправлял круговорот.
Когда он хвост ронял на край бордюра,
всем становилось ясно: будет зной.
Когда вставал, у дворников темнело,
как будто приговор созрел у них.
И даже тень его жила понятием,
не лезла поперёк и знала срок.
В том взгляде было столько тихой бездны,
что бабка в тень убрала табурет.
А он залёг по центру всей мандалы,
как чёрный ход от шума в тишину.
Закат стекал по ржавым водостокам —
общак небес, распиленный на всех.
Он дёрнул ухом — коротко, лениво,
и муха осознала всё сама.
Вот так он нёс незримое смотрение
на этот двор, жару и суету.
Так и залёг — и этого хватало,
чтоб хаос знал, что здесь его пастух.
Он то ли был, и то ли не был,
когда частица портила учёт.
Не кот, а учреждение покоя.
Не зверь, а форма местной пустоты.
И если Будда чалил по окрайнам,
то, может, был вот именно таким.
Śūnyatā’s Cat
The heat came down hard enough to melt a horseshoe.
From the curb, he ran protection for the void.
Easy, lads—don’t go waking nirvana at noon.
Beg pardon, Don—didn’t mean to disturb your Zen.
He narrowed his eyes at eternity and ruled the yard.
A whole SWAT team could have disappeared in that yawn.
Even the heat should’ve checked in with the boss first.
In the local karma, he was a made man—damn near the law.
Oh, the authority of his silence.
Don’t try getting smart with Śūnyatā.
One look from him and the local toughs went half-astral.
Even the curb beneath him creaked with respect.
The overseer slept,
a trace of fang in the grin.
He lay there so completely in command
that even the litter looked apologetic.
That tail of his called the weather for all of us.
Even karma kicked up its cut on time.
The asphalt beneath him had long since reached samadhi.
The young ones kicked in Whiskas for the common fund.
Whenever he washed, the whole yard went still.
He yawned so deep the chain of cause and effect came loose.
The smaller cats all called him Old Man.
The crows—fidgety little monks—
circled overhead, not daring to land beside him.
With one paw he governed the local seasons,
with one claw he kept the wheel of becoming true.
Whenever he let his tail fall over the edge of the curb,
everyone knew: the heat was here to stay.
Whenever he rose, the groundskeepers’ faces darkened,
as if some sentence had quietly ripened.
Even his shadow lived by the code,
never crossing the line, knowing its place, keeping its time.
There was so much quiet abyss in that gaze
an old woman pulled her stool deeper into shade.
And there he lay at the center of the mandala,
like a side door out of noise and into stillness.
Sunset ran down the rusted drainpipes—
heaven’s take, portioned out among the lot.
He twitched an ear—briefly, lazily—
and the fly understood everything on its own.
That was how he kept watch
over the yard, the heat, and the daily nuisance.
And there he remained—and that alone was enough
for chaos to mind its manners here.
He was there and not there,
whenever the tally slipped.
Not a cat, but an institution of stillness.
Not a beast, but the local shape of emptiness.
And if the Buddha ever did time and walked the backstreets,
then maybe he looked exactly like this.
แมวแห่งสุญญตา
แดดแรงจนเกือกม้าแทบละลาย
มันนั่งคุมสุญญตาอยู่บนขอบฟุตบาท
เฮ้ย ไอ้เด็ก ๆ อย่าเสือกปลุกนิพพานตอนเที่ยง
ขอโทษนะเฮีย ไม่ได้ตั้งใจกวนเซนของเฮีย
มันหรี่ตาจ้องอนันต์ แล้วทั้งซอยก็อยู่ใต้อุ้งตีนมัน
แค่หาวทีเดียว หน่วยสวาททั้งกองก็หายวับไปได้
ขนาดแดดยังต้องมาไหว้ลูกพี่ก่อน
ในกรรมของย่านนี้ มันไม่ใช่แมวธรรมดา — แทบจะเป็นกฎของพื้นที่
ความเงียบของมันเองก็มีบารมีข่มคน
ใครห้าวกับสุญญตา มักไปไม่ค่อยไกล
มันปรายตามองทีเดียว พวกเหี้ยคุมซอยก็แทบหลุดจากสังขาร
แม้แต่ขอบปูนใต้ท้องมันยังลั่นเอี๊ยดอย่างให้เกียรติ
เจ้าถิ่นแห่งสังสารวัฏกำลังหลับ
ซ่อนเขี้ยวไว้ตรงมุมยิ้ม
มันวางตัวนิ่งเสียจน
ขยะข้างถนนยังเหมือนรู้สึกผิด
หางเส้นนั้นแหละสั่งฟ้าฝนของทั้งย่าน
แล้วกรรมก็ส่งส่วนแบ่งมาตรงเวลาเป๊ะ
ยางมะตอยใต้ตัวมันเข้าสมาธิไปนานแล้ว
พวกแมวรุ่นเล็กเอา "วิสกัส" มาหยอดเหมือนลงกองกลาง
เวลามันเลียขน ทั้งซอยจะเงียบกริบ
มันหาวลึกเสียจนโซ่ของเหตุและผลแทบคลายออก
แมวตัวเล็กทั้งหลายเรียกมันว่า "พ่อ"
พวกอีกา — เหมือนพระน้อยขี้ร้อนใจ —
ได้แต่บินวนอยู่ข้างบน ไม่กล้าลงมาเทียบรัศมี
แค่อุ้งเท้าเดียว มันก็สั่งฤดูกาลของย่านนี้ได้
แค่กรงเล็บเดียว มันก็ประคองวงล้อวัฏฏะไม่ให้เพี้ยน
พอหางของมันห้อยลงจากขอบฟุตบาท
ทุกคนก็รู้ทันที — วันนี้ร้อนแน่ และร้อนยาว
พอมันลุกขึ้น พวกคนกวาดถนนก็หน้าถอดสี
เหมือนมีคำตัดสินเงียบ ๆ สุกงอมอยู่ในอก
แม้แต่เงาของมันก็ยังรู้กฎ
ไม่ล้ำเส้น ไม่ผิดที่ ไม่ผิดเวลา
ในแววตาคู่นั้นมีหุบเหวเงียบงันอยู่ลึกมาก
จนยายคนหนึ่งต้องรีบลากเก้าอี้เข้าไปหลบในร่ม
มันนอนแผ่อยู่ตรงกลางมณฑลพอดี
เหมือนประตูหลังจากความเอะอะไปสู่ความสงบ
แสงเย็นไหลลงไปตามท่อสนิมเขรอะ
เหมือนฟ้ากำลังแบ่งส่วนของตัวเองลงมาให้ทุกคน
มันกระดิกหูทีหนึ่ง —
สั้น ๆ ช้า ๆ แบบขี้เกียจ —
แค่นั้นแมลงวันก็เข้าใจทุกอย่างเอง
นี่แหละวิธีที่มันคุมอยู่
ทั้งลานนี้ ทั้งความร้อน และความวุ่นวายในแต่ละวัน
มันอยู่ตรงนั้น — แค่นั้นก็พอแล้ว
พอให้ความโกลาหลรู้จักเจียมตัว
มันเหมือนอยู่ และก็เหมือนไม่อยู่
ในเวลาที่ฝุ่นผงเม็ดเดียวทำให้บัญชีทั้งโลกเพี้ยนได้
มันไม่ใช่แมว แต่มันคือสถาบันแห่งความสงบ
มันไม่ใช่สัตว์ แต่มันคือสุญญตาที่มีหนวด
และถ้าพระพุทธเจ้าเคยเดินผ่านตรอกสกปรกหลังตลาด
ก็คงดูคล้ายมันนี่แหละ
空の猫
蹄鉄まで溶けそうな暑さだった。
あいつは縁石の上から、空の後ろを見ていた。
おい、ガキども、真昼間に涅槃を起こすんじゃない。
すみません、旦那——禅の邪魔でもしやしたか。
あいつは細い目で永遠を睨みながら、この界隈を仕切っていた。
ひとつあくびをすれば、機動隊の一隊くらい消えそうだった。
この暑さでさえ、まずは顔役に筋を通すべきだった。
この辺の因果じゃ、あいつはできた奴——ほとんど掟そのものだった。
なんという、黙っているだけの貫禄。
空に向かって粋がるような真似は、よしておくことだ。
ひと睨みで、その辺のワルどもは半分あの世へ抜けた。
腹の下の縁石まで、きしんで敬意を示していた。
見張り番は眠っていた。
口もとには、牙の気配を残したまま。
あまりに悠然と寝そべっているものだから、
道ばたのゴミまで居心地悪そうだった。
あの尻尾が、この界隈の天気を決めていた。
因果もまた、きっちり上前を納めていた。
腹の下のアスファルトは、とっくに三昧に入っていた。
若いのはみんな、ウィスカスを持ち寄って場代にした。
あいつが顔を洗うと、あたりはしんと静まり返った。
あくびは深く、因果の継ぎ目までゆるませた。
小さい猫らは、あいつを「親父」と呼んでいた。
烏ども——落ち着きのない雲水みたいなのが、
近くへ降りる度胸もなく、上をぐるぐる回っていた。
片手でこの土地の季節をまわし、
一本の爪で、めぐりの筋をそっと通していた。
尻尾が縁石の端へ垂れると、
今日はこの暑さが居座るな、とみんな悟った。
立ち上がると、掃除の人たちの顔がふっと曇った。
まるで何かの沙汰が、静かに熟したみたいに。
影までが、ちゃんと筋を知っていた。
出すぎず、場所をわきまえ、頃合いも外さない。
あの目には、音もない深い淵があって、
婆さんは腰掛けを、そっと日陰へ引き直した。
あいつは曼荼羅のまん中に寝そべっていた。
騒がしさから静けさへ抜ける、裏口みたいに。
錆びた雨どいを夕焼けがつたって、
空の取り分が、みんなに分けられていくようだった。
耳をひとつ、ぴくりと動かした——
ほんの少し、気だるそうに。
それだけで、蠅は自分で全部わかったふうになった。
そうやってあいつは、
この庭も、暑さも、日々のわずらいも見ていた。
そこにいる——ただそれだけで充分だった。
それだけで、混沌もここでは行儀を覚えた。
いるようでいて、いないようでもある。
粒ひとつが勘定を狂わせる、そんな折々には。
猫なんかじゃない。静けさの顔役だった。
獣なんかじゃない。この土地に根を張った空だった。
もし仏が場末を流れてきたことがあるのなら、
たぶん、ちょうどこんな面をしていた。
空嘅貓
熱到連馬蹄鐵都似要溶咁。
佢踎喺路壆頂,替個空睇水。
喂,細路,晏晝流流咪喺度搞涅槃。
對唔住啊,大佬——冇阻住你參禪呀嘛。
佢瞇住眼,望實個永恆,成個地頭都由佢睇場。
打一個呵欠,成隊差佬都似會冇咗影。
就連呢陣熱氣,都得先同個話事嗰個打聲招呼。
喺呢頭因果入面,佢係隻見過世面嘅貓——差唔多就係規矩本身。
淨係唔出聲坐喺度,就有一身氣場。
想對住個空扮惡?呢啲念頭,收埋佢好過。
佢一眼掃過去,啲爛仔成班魂都跌咗半截。
連佢肚皮底下條路壆,都咯咯聲咁表示敬意。
個睇水瞓著咗。
嘴角仲留住啲牙鋒。
佢瞓得太從容,太四平八穩,
連路邊啲垃圾都好似唔敢放肆。
嗰條尾,話晒都係管住成個地頭天氣嘅。
就連因果,都識得乖乖交返自己嗰份。
佢肚底下塊地,早就入咗三昧。
啲後生貓個個湊偉嘉,當係交場租。
佢一洗面,四圍即刻靜到出奇。
呵欠一打深咗,連因果接駁位都鬆開。
啲細貓叫佢做阿叔。
啲烏鴉——似班心唔定嘅雲水——
唔夠膽落近,只敢喺上面兜嚟兜去。
佢一隻手咁撥住呢塊地嘅時氣,
一隻爪咁輕輕理順生滅嘅輪轉。
當條尾垂到路壆邊,
大家就知:今日呢陣熱,仲有排坐。
佢一企起身,清潔工啲面色就即刻沉一沉。
好似有啲乜嘢發落,靜靜地熟咗。
連影都識規矩。
唔會過界,知自己位,時辰都唔會亂。
嗰對眼入面,有個無聲無息嘅深潭,
阿婆就將張櫈仔,悄悄咁挪入多少少陰。
佢攤喺曼荼羅正中間。
好似由嘈雜遁入清靜嘅後門。
斜陽沿住生銹水渠慢慢淌落嚟,
好似連天上嗰份,都畀人分好晒。
佢隻耳輕輕一彈——
帶少少懶,帶少少厭。
就咁一下,啲蒼蠅都似忽然明晒。
佢就係咁,
睇住呢個院,睇住呢陣熱,睇住日常啲煩擾。
佢喺度——淨係咁就夠。
淨係咁,連混沌去到呢度都學識守規矩。
似喺,又似唔喺。
等到微塵撥亂咗數嗰啲時候,就尤其係。
佢唔係貓,係靜氣嘅話事人。
佢唔係獸,係喺呢塊地生根嘅空。
如果佛祖真係行過啲橫街窄巷,
大概,就係咁上下嘅面口。
शून्यता का बिल्ला
धूप ऐसी पड़ रही थी कि घोड़े की नाल पिघल जाए।
वह फुटपाथ के किनारे बैठा, शून्यता पर पहरा दे रहा था।
ओए छोकरों, दोपहर में निर्वाण मत छेड़ो।
माफ करना, उस्ताद—तुम्हारे ज़ेन में खलल तो नहीं डाला?
आँखें मींचे वह अनंत को ताड़ रहा था, और पूरा मोहल्ला उसी के दम पर चलता था।
उसकी एक जम्हाई में पूरी पुलिस की टुकड़ी ग़ायब हो जाए।
यह धूप भी पहले बड़े मियाँ को सलाम ठोककर आए।
यहाँ के कर्म के धंधे में वह कोई आम बिल्ली नहीं था—लगभग वही क़ानून था।
क्या रौब था उसके चुप पड़े रहने में।
शून्यता के आगे अकड़ दिखाने वाले ज़्यादा दूर नहीं जाते।
उसकी एक नज़र, और गली के दबंग आधे जिस्म से खिसक लें।
उसके नीचे का फुटपाथ भी इज़्ज़त से चरमराता था।
मोहल्ले का रखवाला सो रहा था,
होंठ के कोने में दाँत की धार छिपाए।
वह इस इत्मीनान से पसरा था
कि सड़क का कचरा भी हद में रहता।
उसकी पूँछ पूरे इलाके का मौसम चलाती थी।
और कर्म भी अपना हिस्सा वक़्त पर चढ़ा देता था।
उसके नीचे की डामर कब की समाधि में पड़ी थी।
छोटे बिल्ले “व्हिस्कस” डालते, जैसे इलाक़े का चंदा भर रहे हों।
वह मुँह धोता, तो पूरा मोहल्ला थम जाता।
वह ऐसी गहरी जम्हाई लेता कि कारण और नतीजे की जंजीर ढीली पड़ जाए।
छोटे बिल्ले उसे “बाबा” कहते थे।
कौए—बेचैन छोटे फ़क़ीरों जैसे—
ऊपर-ऊपर चक्कर काटते, पास उतरने की हिम्मत नहीं करते।
एक पंजे से वह यहाँ का मौसम पलट देता,
एक नाखून से संसार का चक्कर सीधा रखता।
जब उसकी पूँछ फुटपाथ के किनारे से नीचे लटकती,
सब समझ जाते—आज गर्मी टस से मस नहीं होगी।
जब वह उठता, सफ़ाईवालों के चेहरे बुझ जाते,
जैसे कोई ख़ामोश फ़ैसला भीतर ही भीतर पक चुका हो।
उसकी परछाईं भी उसूल जानती थी—
न हद लाँघती, न जगह भूलती, न वक़्त।
उसकी आँखों में इतनी चुप गहराई थी
कि एक बूढ़ी औरत अपनी चौकी और भीतर छाँव में सरका लेती।
वह मंडल के ठीक बीचोंबीच पसरा था,
जैसे शोर से सन्नाटे में जाने का पिछला दरवाज़ा।
शाम जंग लगे नालों पर बहती उतरती थी,
मानो आसमान नीचे अपने टुकड़े बाँट रहा हो।
उसने कान झटका—
ज़रा-सा, सुस्ती से।
बस उतने भर से मक्खी को सब समझ आ गया।
यही उसका ढंग था
इस आँगन, इस गर्मी, और रोज़ की झंझट पर नज़र रखने का।
वह वहाँ था—और इतना ही काफ़ी था।
बस उससे ही अफ़रा-तफ़री यहाँ आकर तमीज़ सीखती थी।
वह था भी, और जैसे नहीं भी था,
जब धूल का कोई ज़र्रा हिसाब बिगाड़ देता।
वह बिल्ली नहीं था, ठहराव की पूरी हुकूमत था।
वह जानवर नहीं था, इस मोहल्ले में शून्यता की शक्ल था।
और अगर बुद्ध कभी पिछली गलियों से गुज़रे होते,
तो कुछ ऐसे ही दिखते।
U Jattu dâ Śūnyatā
Nu cavuru accussì forti ca squagghiava i ferri dî cavaddi.
Dô marciapiedi, iddu facìa u guardaspaddi â vacuità.
Pianu, picciotti — nun arrisbigghiati u nirvana a menzujornu.
Pirdunatimi, Don — nun vulìa scunzirari u vostru zen.
Talìava l'eternità a menz’occhi e tinìa sutta iddu tuttu u curtigghiu.
Ntra ddu sbadigghiu putìa spariri macari na squatra armata sana.
Puru u suli avìa a passari prima a dari rispettu ô Zu.
Nnô karma dâ zona, nun era nu jattu qualunqui — era quasi a liggi.
Chi gran pisu avìa ddu silenziu.
Cu Śūnyatā nun si fa u spertu, sinnò finisci mali.
Na taliata, e i guappi dû quarteri si nni jìanu mezzi astrali.
Puru u marciapiedi sutta di iddu scrusciava cu rispettu.
U signuri dû quarteri durmìa,
na punta di zanna ammucciata ô cantu dâ vucca.
Stava stinnicchiatu cu tanta sicurizza
ca puru a munnizza parìa aviri vergogna.
Dda cuda, senza dubbiu, cumannava u tempu pi tutti nuatri.
E u karma ci purtava a so parti precisa spaccata ô minutu.
L’asfaltu sutta di iddu avìa gghià pigghiatu u samadhi.
I jatti cchiù nicareddi ci purtavanu “Whiskas” comu si fussi na quota pi a cassa cumuna.
Quannu si lavava a facci, tuttu u quarteri si zittìa.
Sbadigghiava accussì a funnu ca a catina di causa e effettu s’allintava.
I jatti cchiù nichi u chiamavanu “Zu”.
I cuorvi — monaci ntrizzusi e senza paci —
firriavanu supra, senza curaggiu di calari vicinu a iddu.
Cu na zampa cumannava i staggiuni dâ zona,
cu n’ugna tinìa dritta a rota dû samsara.
Quannu a so cuda cascava fora dô bordu dû marciapiedi,
tutti u capìanu: u cavuru nun si nni va.
Quannu s’aizzava, i spazzini addivintavanu scuri ‘nfacci,
comu si na sintenza fussi maturata ‘n silenziu pi iddi.
Puru a so ummira canuscìa i reguli:
nun passava u signu, nun sbagghiava locu, nun sbagghiava tempu.
Nni dda taliata c’era tantu abissu mutu
ca na vecchia si strascinava a seggia cchiù rintra ô friscu.
Iddu stava stinnicchiatu propriu ô centru dû mandala,
comu na porta ammucciata pi nesciri dû fracassu e trasiri nnô silenziu.
U tramuntu scurrìa pi i canali arrugginiti,
comu si u celu stissu spartissi i so pezzi pi tutti.
Scutulìu n’aricchia —
picca picca, cu lagnusia.
E basta chiddu pi fari capiri tuttu â musca.
Accussì era u so modu
di teniri d’occhiu stu curtigghiu, stu cavuru, e tutti i sciarri d’ogni jornu.
Iddu era ddà — e chistu sulu bastava.
Bastava pi fari amparari u rispettu ô caos.
Era ddà e nun era ddà,
quannu macari na muddica di pruvulazzu scunzulava i cunti.
Nun era nu jattu, era n’istituzioni di silenziu.
Nun era na bestia, era a vacuità cu i baffi.
E si u Budda avissi mai passatu pî strati arrè,
avissi avutu propriu sta facci.
قط الشونياتا
الجو نار تسيّح حدوة الحصان،
وهو قاعد عالرصيف، مبلطج عالفراغ.
إياك يا واد تصحي النيرفانا في عزّ الضهر.
لامؤاخذة يا معلم، هو أنا نغّصت على الزنّ بتاعك؟
مضيّق عينيه في وشّ الأبدية، ومثبّت الحتّة.
في التتاوبة بتاعته تضيع فرقة أمن مركزي.
حتى الحرّ لازم ياخد إذن من المعلم.
في كارما المنطقة، هو الفتوة — والكلمة كلمته.
يا عيني على هيبة سكوته.
تعمل فيها شبح على الشونياتا؟ تبقى بتلعب في عدّاد عمرك.
بصّة واحدة منه، وصيع الحتّة ينزلوا من العالم النجمي.
الرصيف تحته بيطقطق من كتر الاحترام.
الكبير نايم،
ومداري الناب في ابتسامة صفرا.
فارد فردته، لدرجة إن الزبالة نفسها كانت بتتأسف له.
أيوه، الديل ده هو اللي بيمشي الجو على مزاجنا.
والكارما بتدفع الإتاوة في ميعادها بالقرش.
الأسفلت تحته واصل للسمادي من زمان.
الرجالة بتلم ويسكاس لجمعية الحتّة.
المنطقة تكتم نفسها وهو بيغسل وشّه.
يتتاوب بغشومية، لحد ما السبب والنتيجة نفسهم يرخّوا.
القطط السيس بتسميه: البابا.
والغربان — رهبان متسربعين —
بيلفّوا فوقيه، ومحدّش فيهم فيه حيل يهبط جنبه.
بكفّه يظبط فصول السنة،
وبمخلبه يخلّي عجلة السامسارا ماشية عدل.
لما يرمي ديله على حرف الرصيف،
الكل يفهم: الحرّ لسه مطوّل.
ولما يقف، عمال النضافة الدنيا تضلم في وشّهم،
كأن حكمًا اتكتب عليهم في السر.
حتى ضلّه ماشي بالأصول،
ما بيتخطّاش حدوده، وعارف مقامه ووقته.
في عينيه كمية فناء وسكوت،
تخلّي الحجّة تشد كرسيها وتستخبّى في الضلّة.
وهو مبلط في نصّ الماندالا،
زي باب خلفي يخرجك من الدوشة للروقان.
الغروب بيسيل على مواسير الصدأ،
كأن السما بتوزّع نصيبها عالكل.
رفّ ودنه —
عالهادي، وبكسل —
فالدبانة فهمت كل حاجة لوحدها.
كده كان بيفرض سيطرته
على الحتّة، والحرّ، ومرمطة الأيام.
مبلط كده — وده كان كفاية،
عشان الفوضى تعرف تمشي عدل.
كان موجود ومش موجود في نفس الوقت،
لما ذرة تراب واحدة تبوّظ حساب الدنيا.
ده مش قط، ده مؤسسة سكينة.
ده مش حيوان، ده الفراغ نفسه طالع له شنب.
ولو بوذا كان لفّ في حواري الدنيا المتربة،
كان يبقى له نفس الوش ده.
El Gato de la Śūnyatā
El calor pegaba tan cabrón que derretía las herraduras.
Desde la banqueta, el güey le cobraba piso a la nada.
Cálmenla, morros — no me despierten al nirvana en pleno mediodía.
Con todo respeto, Patrón — no quería picarle la cresta a su zen.
Le hacía los ojos chiquitos a la eternidad y controlaba la plaza.
En ese bostezo se te podía desaparecer un comando entero.
Hasta el clima tenía que reportarse con el Jefe.
En el karma del barrio, él era el mero mero — la pura ley.
Ay güey, la cabrona autoridad de su silencio.
No le juegues al vergas a la Śūnyatā si quieres seguir contando tus días.
Una mirada suya y los malandros del bloque se iban de cabeza al viaje astral.
Hasta el cemento de la banqueta rechinaba de puro respeto.
El jefe de plaza dormía,
pelando un colmillo detrás de la sonrisa.
Estaba tan tirado a sus anchas que hasta la basura pedía perdón.
Esa cola, la neta, nos dictaba el clima a todos.
Y el karma pagaba su cuota rayando a tiempo.
El asfalto abajo de él ya llevaba rato en samadhi.
La clica caía con sobres de “Whiskas” pa’ la caja grande.
Todo el bloque cerraba el hocico cuando él se acicalaba.
Bostezaba tan profundo que la ley de causa y efecto se iba a la chingada.
Los gatos más morros le decían “El Apá”.
Los cuervos — pinches monjes paniqueados —
daban vueltas, sin huevos pa’ aterrizar a su lado.
Con una garra controlaba las temporadas del año,
y con una uña alineaba el desmadre del samsara.
Cuando dejaba caer la cola por el borde de la banqueta,
toda la raza sabía: la calorona venía pa’ quedarse.
Cuando se paraba, a los barrenderos se les fruncía,
como si la sentencia ya les hubiera caído en silencio.
Hasta su sombra jalaba con los códigos,
nunca se pasaba de la raya, conocía su lugar, respetaba la línea.
Había tanto pinche abismo mudo en esa mirada,
que la doña arrastró su banco más pa’ la sombrita.
Y ahí estaba tirado, en el mero centro del mandala,
como puerta falsa pa’ pelarse del ruido y entrar al silencio.
El atardecer escurría por los tubos oxidados —
la feria del cielo, repartida entre toda la banda.
Paró una oreja — un segundito, de hueva —
y la mosca agarró la onda solita.
Así mantenía a raya la plaza,
el calor, y la bronca de a diario.
Ahí se quedaba — y con la pura presencia bastaba
pa’ que el caos supiera quién mandaba en el barrio.
Estaba y no estaba, al mismo tiempo,
cuando los números del cuadre no cuadraban.
No era un gato, era la santa institución del silencio.
No era un animal, era la puta vacuidad con bigotes.
Y si el Buda alguna vez se hubiera tirado al barrio,
seguro traía esta misma cara.
O Gato da Śūnyatā
O calor tava tão sinistro que derretia até ferradura.
Da calçada, ele cobrava arrego pro Vazio.
Na moral, menor — não vai acordar o nirvana no meio-dia.
Foi mal, Patrão — não queria esculachar teu zen.
Cerrou os olhos pra eternidade e dominou a área.
Um batalhão inteiro sumia dentro daquele bocejo.
Até o maçarico do sol tinha que pedir licença pro Chefe.
No karma da quebrada, ele era o Dono — a própria lei.
Papo reto: olha a autoridade daquele silêncio.
Não tenta tirar onda com a Śūnyatā, senão tu some do mapa.
Uma encarada dele, e os cria mergulhavam no astral.
Até o meio-fio debaixo dele estalava de respeito.
O patrão do samsara roncava,
escondendo a presa no sorriso.
Tava tão largado na postura
que até o lixo pedia desculpa.
Aquela cauda, sem caô, ditava o clima pra geral.
E o karma pagava a caixinha sem atrasar.
O asfalto lá embaixo já tinha batido samadhi faz tempo.
Os menor juntavam Whiskas pro caixa da área.
A quebrada inteira ficava calada quando ele se lambia.
Dava um bocejo tão fundo que causa e efeito iam pro ralo.
Os gato menor chamavam ele de Coroa.
Os corvo — uns monge tudo noiado —
ficavam rondando, sem coragem de pousar do lado.
Com uma pata ele ditava as estações do ano,
com uma garra ele alinhava a roda do destino.
Quando a cauda caía da calçada,
geral já sabia: o calor vinha pra ficar.
Quando ele levantava, a vista do gari escurecia,
como se a cobrança já tivesse chegado em silêncio.
Até a sombra dele andava na disciplina,
não passava da linha, sabia o lugar, respeitava o tempo.
Tinha tanto abismo calado naquela visão
que a tiazinha puxou a cadeira mais pra sombra.
E lá ficava ele no miolo da mandala,
tipo uma saída secreta do barulho pro silêncio.
O pôr do sol escorria pelos canos enferrujados —
a partilha do céu, caindo igual pra geral.
Deu um pique na orelha — na maciota, com preguiça —
e a mosca pegou a visão sozinha.
Era assim que ele mantinha a área,
o calor, e o caô do dia a dia na rédea curta.
Ficava lá esticadão — e só a presença já bastava
pro caos baixar a cabeça e respeitar o Patrão.
Ele tava lá e não tava, ao mesmo tempo,
quando a conta do mundo fechava errado.
Não era um gato, mermão — era o Comando do Silêncio.
Não era bicho — era a vacuidade de bigode.
E se o Buda um dia tivesse descido pra rua,
ia ter exatamente essa cara.
Le Chat du Néant (Śūnyatā)
Le cagnard tapait si fort qu’il faisait fondre les fers.
Depuis l’trottoir, il raquettait le Néant.
Doucement, les gars — allez pas réveiller le nirvana en plein midi.
Pardon, le Patron — j’voulais pas froisser ton zen.
Il plissait les yeux sur l’éternité et tenait le quartier.
Un bataillon entier aurait pu s’perdre dans son bâillement.
Même la canicule devait pointer chez le Boss.
Dans le karma du bloc, c’était le Patron — la loi en personne.
Putain, l’autorité de son silence.
Fais pas le malin avec la Śūnyatā si tu tiens à tes jours.
Un regard, et les durs du bloc partaient en voyage astral.
Même le bitume sous lui craquait de respect.
Le patron du samsara pionçait,
un croc qui dépasse sous le sourire.
Il était tellement posé en chef
que même les détritus rasaient les murs.
Cette queue, direct, faisait la météo pour tout le monde.
Et le karma crachait sa part à l’heure pile.
Le goudron en dessous avait touché le samadhi depuis longtemps.
Les petits cotisaient du Whiskas pour la caisse du bloc.
Tout l’immeuble se taisait quand il faisait sa toilette.
Il bâillait si profond que la loi de cause à effet partait en vrille.
Les jeunes chats l’appelaient tous le Padre.
Les corbeaux — ces moines à cran —
tournaient au-dessus, pas capables de se poser à côté.
D’une patte il réglait les saisons,
d’une griffe il remettait la roue du destin dans l’axe.
Quand sa queue tombait sur le bord du trottoir,
tout le monde captait : le cagnard venait pour durer.
Quand il se levait, les balayeurs voyaient flou,
comme si la sentence leur était tombée dessus en silence.
Même son ombre respectait les codes,
franchissait pas la ligne, connaissait sa place.
Y avait tellement d’abîme muet dans son regard
qu’une daronne a reculé sa chaise dans l’ombre.
Et il était posé là, au centre du mandala,
comme une sortie discrète du vacarme vers le silence.
Le crépuscule dégoulinait sur les gouttières rouillées —
le partage du ciel, tombé pareil pour tout le monde.
Il a bougé une oreille — un rien, avec la flemme —
et la mouche a compris toute seule.
C’est comme ça qu’il tenait le bloc,
la chaleur, et toutes les galères du quotidien.
Il restait calé là — et sa seule présence suffisait
pour que le chaos baisse la tête.
Il était là et pas là, en même temps,
quand les comptes du monde tombaient faux.
C’était pas un chat, mec — c’était l’institution du silence.
Pas une bête — la vacuité à moustaches.
Et si le Bouddha était un jour descendu dans la rue,
il aurait eu exactement ce visage-là.
공(空)의 고양이
말발굽마저 녹아내릴 듯한 폭염이었다.
녀석은 보도블록 위에 드러누운 채, 허무에게서 자릿세를 받아내고 있었다.
어이, 꼬마들아. 한낮에 열반 타령은 집어치워라.
실례하겠습니다, 보스—참선에 방해될 생각은 없습니다.
녀석은 가늘게 뜬 눈으로 영원을 쏘아보며
이 바닥 전체를 말없이 틀어쥐고 있었다.
하품 한 번이면 기동타격대 하나쯤 통째로 증발할 듯했고,
이 지독한 더위조차 먼저 그 앞에 고개를 숙여야 했다.
그 침묵의 깡다구라니.
공 앞에서 까불다간 골로 가기 십상이었다.
눈빛 한 번에 동네 양아치들까지 반쯤 저세상으로 밀려날 판이었고,
녀석이 짓누른 보도블록마저 경건하게 삐걱거렸다.
윤회의 대부가 코를 골며 낮잠을 자고 있었다.
입꼬리에는 웃음이 걸려 있었고, 송곳니는 그 뒤에 잠잠히 숨어 있었다.
너무도 태평하게 퍼져 있는 바람에
길바닥의 쓰레기조차 미안한 듯 몸을 낮췄다.
저 꼬리야말로 이 동네의 일기예보를 쥐락펴락하는 진짜 실세였고,
업보마저 때가 되면 꼬박꼬박 제 몫을 상납했다.
녀석 발밑의 아스팔트는 진작 삼매에 들었다.
어린 고양이들은 구역세처럼 먹다 남은 부스러기를 바쳤다.
녀석이 세수를 하면 동네 전체가 숨을 죽였고,
하품이 너무 깊어 인과응보의 톱니바퀴마저 헐거워질 지경이었다.
꼬마 고양이들은 녀석을 큰어른이라 불렀다.
까마귀들—불안에 절은 떠돌이 중놈들처럼—
머리 위만 빙빙 돌 뿐, 감히 곁에 내려앉지 못했다.
녀석은 앞발 하나로 계절을 다스리고,
발톱 하나로 윤회의 바퀴를 슬쩍 밀어두는 것만 같았다.
꼬리가 보도블록 아래로 툭 늘어지는 날이면
모두가 알았다—오늘도 더위는 눌러앉아 떠나지 않으리라는 걸.
녀석이 몸을 일으키는 순간이면
미화원들의 얼굴이 잿빛으로 굳었다.
마치 말 없는 판결문이 조용히 전달된 것처럼.
녀석의 그림자조차 선을 넘지 않았다.
제 자리를 알고, 제때를 알고, 제 몫의 침묵을 알고 있었다.
그 눈빛 속에는 너무도 깊고 소리 없는 구렁이 패여 있어서
지나가던 할머니조차 말없이 그늘 쪽으로 자리를 옮겼다.
녀석은 만다라의 한복판에 처박혀 있었다.
소음 한가운데서 고요로 빠져나가는 비밀 뒷문처럼.
녹슨 배수관을 타고 저녁 햇빛이 흘러내렸고,
하늘의 몫이 통째로 이 골목에 쏟아져 내리는 듯했다.
녀석은 귀를 한쪽만 씰룩였다.
대충, 귀찮다는 듯, 아무 힘도 들이지 않고.
그것만으로도 파리 한 마리가
세상 이치의 경계를 알아서 깨닫고 물러났다.
녀석은 그저 지켜보고 있었다.
이 마당을, 이 불볕을, 이 하루치의 고단하고 엿 같은 생을.
그냥 거기 누워 있는 것만으로도 충분했다.
혼돈마저 제 발로 기어와 예의를 차리게 만들기에는.
있는 듯했고, 없는 듯했다.
세상의 셈법이 먼지 한 톨 앞에서 송두리째 어긋나는 순간처럼.
그건 그냥 고양이가 아니었다.
고요가 잠시 털을 뒤집어쓴 형상이었다.
짐승이 아니었다.
수염을 기른 생짜 공(空)이었다.
만약 부처가 이런 뒷골목을 떠돌며
바닥 인생의 더위와 먼지를 함께 견디며 살았다면,
아마도 딱 이런 얼굴을 하고 있었을 것이다.
Cat na hFholmhaíochta
Bhí an teas chomh tréan sin go leáfadh sé crú capaill.
Bhí seisean sínte ar an gclochán, amhail is go raibh cáin suíocháin á baint aige den fholús féin.
A mhaistíní, go réidh libh — ná bígí ag múscailt an nirvāṇa i lár an lae.
Gabh mo leithscéal, a Cheannasaí — níor mhian liom do shamadhi a chur as riocht.
Le súile leathdhúnta, bhí sé ag féachaint isteach san tsíoraíocht
agus a láithreacht féin i gceannas ar an gclós ar fad.
Le haon bhéic chiúin dá chuid, d’fhéadfaí scuad iomlán a chur ó mhaith,
agus bhí ar an ngrian féin géilleadh dó sula leagadh sí a teas ar an áit.
Ó, nach tromchúiseach údarás an chiúnais sin.
Níorbh fholáir gan a bheith ag déanamh gaisce os comhair na Folmhaíochta.
Le haon amharc amháin uaidh,
rachadh fiáinfhir na sráide ar seachrán mar a mbeidís leathshlogtha ag saol eile.
Bhí fiú an chloch faoi féin ag géilleadh go ciúin dá thromchúis.
Mar rí na saṃsāra féin, bhí sé ina luí i suan,
fiacla folaithe taobh thiar de gháire beag, séimh agus bagrach araon.
Bhí sé chomh suaimhneach sin sínte amach
gur fhan fiú an bruscar féin ina áit, amhail is gur ghabh sé leithscéal.
Ba é gluaiseacht a eireabaill a shocraigh aimsir an lae,
agus d’íoc an karma féin a cháin go tráthrialta leis.
Bhí an bóthar faoina bhrollach tar éis dul isteach i samādhi le fada.
Thug na cait óga blúirí beaga bia chuige mar ómós is mar chíos.
Nuair a nigh sé é féin,
thit ciúnas ar an gceantar ar fad.
Nuair a rinne sé síneadh agus a bhéal á oscailt go mall,
bhí cuma ar chúis agus ar iarmhairt araon go raibh siad ag scaoileadh as a chéile.
Thug na piscíní “An Seanóir” air.
Agus na préacháin, amhail manaigh bheaga corrmhíshuaimhneacha,
ní dhéanadh siad ach ciorcal os a chionn, gan teacht anuas riamh.
Le haon lapa amháin choinníodh sé na séasúir faoi smacht,
agus le haon chrúb amháin bhrúdh sé roth an ama ar aghaidh.
Nuair a leagadh a eireaball thar imeall an chlocháin,
ba léir do chách go mairfeadh an teas i bhfad fós.
Nuair a d’ardaíodh sé é féin,
thagadh liathghruaim ar aghaidheanna lucht glanta na sráide,
amhail is go raibh breithiúnas ciúin tugtha anuas orthu.
Níor sháraigh fiú a scáth an teorainn.
Bhí eolas aige ar a áit, ar a thráth, agus ar a thost féin.
Bhí doimhneacht dhorcha neamhfhoclach ina shúile,
agus dá barr sin bhog seanbhean a cathaoir isteach sa scáth gan focal.
Bhí sé sínte amach i lár an mhandala,
cosúil le doras rúnda amach as an torann isteach sa tsíocháin.
Bhí solas na hoíche ag sileadh síos na píopaí meirgeacha,
agus áilleacht na spéire á roinnt go cothrom ar an uile ní.
Chroith sé cluas amháin go mall —
go leisciúil, gan oiread is iarracht.
Agus leis sin amháin, thuig an chuileog féin a háit sa chruthú.
Mar sin a choinnigh sé an clós, an teas,
agus leadrán crua an lae faoina smacht i gciúnas.
Bhí sé ann ina luí — agus ba leor sin,
ionas go gcuirfeadh fiú an t‑anord a cheann faoi.
Bhí sé ann, agus ní raibh sé ann,
amhail is go raibh cuntas an domhain féin ag titim as a chéile mar bhréag.
Ní gnáthchat a bhí ann.
Ba é suíochán na síochána é.
Ní ainmhí a bhí ann.
Ba é an folús féin é, agus fionnadh is guairí curtha air.
Dá dtiocfadh an Búda anuas riamh ar an tsráid seo,
is mar seo a bheadh a chuma.
शून्यतामार्जारः
तीव्र आतपोऽभूद् यद् आयोऽपि द्रवेत् ।
रथ्यातीरे स स्थितः शून्यतायाः प्रभुरिव ॥
मा, बालाः, मध्याह्ने निर्वाणं प्रबोधयत ।
क्षम्यतां, स्वामिन् — न ते ध्यानभङ्गमिच्छामि ॥
निमीलितलोचनः सोऽनन्तमिव पश्यन्
स्वतेजसा प्राङ्गणमखिलमधितस्थौ ।
तस्य जृम्भमाणस्य वक्त्रे सेनापि विनश्येत्,
उष्णांशुरपि तस्य पुरतः विनीत इवाभाति ॥
अहो तस्य मौनस्य महिमा ।
शून्यतामधिरुह्य कः पुनर्दर्पमाचरेत् ।
तस्यैकया दृष्ट्या धृष्टा अपि जनाः
अदृष्टमेव पदमिव प्रविशेयुः ।
पाषाणोऽपि तस्य गौरवेण नम्र इवाभूत् ॥
संसारस्य स्वामीव स निद्रामुपागतः,
स्मितच्छन्नदंष्ट्रः शान्तभयानकश्च ।
तस्य प्रभावेण पतितमप्यवकरं
मूकं स्वस्थान एवावतस्थे ।
तस्य पुच्छचालनमेव दिवसतापं विधत्ते,
कर्म च तस्मै स्वभागमर्पयति ॥
तस्याधस्तान्मार्गः समाधिमिव गतः ।
लघुमार्जारकास्तस्मै भक्ष्यलेशानुपाजह्रुः ।
स यदा स्वदेहं प्रक्षालयति,
तदा सर्वः प्रदेशः स्तब्धो भवति ।
स यदा जृम्भते,
तदा कारणकार्यक्रमोऽपि शिथिल इव दृश्यते ॥
कनीयांसो मार्जारास्तं तात इति वदन्ति ।
काकाश्च चञ्चलभिक्षव इव
ऊर्ध्वमेव परिवर्तन्ते, नावतरन्ति ।
एकेन पादेन स ऋतून् नियच्छति,
एकेन नखेन कालचक्रं प्रणयति ॥
यदा तस्य पुच्छं रथ्यापार्श्वे पतति,
तदा सर्वे जानन्ति — दीर्घमुष्णं भविष्यतीति ।
यदा सोत्तिष्ठति,
तदा मार्गशोधकानां दृष्टिर्मलिनी भवति,
यथा मौनमेवाज्ञां ददाति ॥
तस्य छायापि मर्यादां नातिक्रामति,
स्वस्थानं जानाति, कालं च वेत्ति ।
तस्य दृष्टौ गम्भीरमौनगह्वरमासीत्,
यत्समीपस्था वृद्धापि छायामेव शरणं ययौ ॥
स मण्डलमध्यवर्ती निषसाद,
यथा कोलाहलात् शमं प्रति गुह्यमार्गः ।
सायंतनदीधितयः जीर्णनलिकासु स्रवन्त्यः
समं दिवो विभवं सर्वेषु वितरन्ति ॥
स कर्णमेकं शनैरचालयत् ।
ततः सा मक्षिका स्वयमेव मर्यादामबुध्यत ।
एवं स एव प्राङ्गणं तापं च
दिवसक्लेशं च निःशब्दमधितस्थौ ॥
स तत्र शयान एव पर्याप्तः,
येन अराजकतापि शिरसा नमेत् ।
स आसीदिव, नासीदिव च,
यदा जगद्गणना मिथ्येव प्रतिभाति ॥
नायं मार्जारमात्रः ।
एष शान्तेरासनम् ।
नायं पशुः ।
एष शून्यतायाः सश्मश्रुविग्रहः ।
यदि बुद्धः कदाचिदस्यां रथ्यायामवतरेत्,
तर्ह्येवमस्य रूपं स्यात् ॥